102 की उम्र में भी जीत: रामकृष्ण CARE हॉस्पिटल्स, रायपुर में शतायु महिला ने सफल सर्जरी से दी मिसाल
• 102 वर्षीय मरीज की दुर्लभ और उच्च जोखिम वाली सर्जरी सुरक्षित रूप से की गई
• मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने चार दिनों में रिकवरी सुनिश्चित की
• यह मामला साबित करता है कि केवल उम्र जीवनरक्षक इलाज में बाधा नहीं बननी चाहिए
रायपुर, 28 अप्रैल, 2026: 102 वर्ष की उम्र में, जब अधिकांश लोग शारीरिक कमजोरी को जीवन का हिस्सा मान लेते हैं, तब रायपुर की पुष्पा देवी (नाम परिवर्तित) ने साहस, दृढ़ता और चिकित्सा संभावनाओं की एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने एक जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक करवाई, जिसे कई लोग दशकों पहले भी करवाने से हिचकिचाते।
पिछले 12 वर्षों से वह सुप्राअम्बिलिकल हर्निया (नाभि के ऊपर होने वाला हर्निया) के साथ जीवन जी रही थीं। सपोर्ट बेल्ट की मदद से उन्होंने अपनी स्थिति को संभाला और सक्रिय एवं स्वतंत्र जीवन जीती रहीं। उनकी दिनचर्या लगभग सामान्य थी, जब तक कि यह समस्या गंभीर रूप नहीं ले बैठी। हर्निया धीरे-धीरे बढ़ता गया और अंततः अवरुद्ध (ऑब्स्ट्रक्टेड) हो गया, जिससे उन्हें तेज दर्द होने लगा और यह उनकी जान के लिए तत्काल खतरा बन गया। इसी दौरान उन्हें पित्ताशय (गॉलब्लैडर) में पथरी की भी समस्या का पता चला, जिससे चिकित्सकीय स्थिति और जटिल हो गई।
102 वर्ष की उम्र में सर्जरी का निर्णय बिल्कुल आसान नहीं था। परिवार के सामने वही सवाल था, जिसका सामना कई लोग ऐसे समय में करते हैं—क्या इस उम्र में सर्जरी का जोखिम उठाना सही होगा? एनेस्थीसिया, रिकवरी और शरीर की सहनशक्ति को लेकर चिंताएं स्वाभाविक थीं।
लेकिन जब हर्निया अवरुद्ध हो गया, तब सोच-विचार के लिए समय नहीं बचा। स्थिति ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
तभी रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल की टीम आगे आई।
डॉ. संदीप डेव, डायरेक्टर – रोबोटिक सर्जरी, के नेतृत्व में डॉ. सिद्धार्थ तमस्कर विभागाध्यक्ष, मिनिमल एक्सेस सर्जरी, डॉ. जव्वाद नक़वी, डॉ. विक्रम शर्मा और डॉ. शमीक डेव की टीम ने इस मामले को अत्यंत सावधानी और सटीक योजना के साथ संभाला। मरीज की उम्र को देखते हुए प्री-ऑपरेटिव जांच, एनेस्थीसिया प्रबंधन और पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल—हर पहलू पर विशेष सतर्कता बरती गई।
सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की गई, जो एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय उपलब्धि रही।
हालांकि, असली प्रेरणादायक पहलू उनकी रिकवरी रही। मरीज को केवल चार दिनों में डिस्चार्ज कर दिया गया और एक सप्ताह के भीतर वह अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आईं—चलना-फिरना, लोगों से मिलना-जुलना और उसी उत्साह के साथ जीवन जीना, जिसने उन्हें एक सदी तक आगे बढ़ाया।
इस मामले पर विचार साझा करते हुए डॉ. संदीप डेव ने कहा,
“वृद्ध मरीजों में सर्जरी का निर्णय हमेशा बहुत सोच-समझकर लिया जाता है। यह केवल उम्र का सवाल नहीं होता, बल्कि मरीज की कार्यक्षमता, स्थिति की गंभीरता और जोखिमों को प्रभावी ढंग से संभालने की क्षमता पर निर्भर करता है। इस मामले में समय पर हस्तक्षेप और समन्वित टीम प्रयास ने बड़ा अंतर पैदा किया। सर्जरी और एनेस्थीसिया देखभाल में प्रगति के साथ, केवल उम्र उपचार देने में बाधा नहीं बननी चाहिए।”
यह मामला केवल एक चिकित्सकीय सफलता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की बदलती सोच को भी दर्शाता है। अब डॉक्टर इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि केवल उम्र ही उपचार संबंधी निर्णयों का आधार नहीं होनी चाहिए। बेहतर जोखिम मूल्यांकन, उन्नत सर्जिकल तकनीक और बेहतर क्रिटिकल केयर सपोर्ट के कारण बुजुर्ग मरीजों के परिणाम लगातार बेहतर हो रहे हैं।
यह मामला परिवारों की भूमिका की भी एक सशक्त याद दिलाता है—जहां डर और विश्वास के बीच संतुलन बनाकर सही समय पर कठिन निर्णय लिए जाते हैं।
असल मायनों में यह कहानी तीन शक्तियों के संगम को दर्शाती है—मरीज की दृढ़ इच्छाशक्ति, परिवार का साहस और मेडिकल टीम की विशेषज्ञता।
रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल के लिए यह सिर्फ एक सफल सर्जरी नहीं, बल्कि अपनी प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि है—मरीजों की देखभाल में सीमाओं को आगे बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना कि हर जीवन, चाहे उम्र कोई भी हो, उसे बेहतर उपचार का पूरा अवसर मिले।
क्योंकि कई बार दवा इलाज करती है—लेकिन विश्वास और साहस ही असली रिकवरी संभव बनाते हैं।
