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समाज संगठित और गुणवान बनेगा, तभी देश में परिवर्तन होगा – डॉ. मोहन भागवत जी

Abhinesh Pandey February 8, 2026

 

रायपुर / मुंबई, 07 फरवरी 2026।

संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि संघ समाजरूप संगठन खड़ा करना चाहता है। समाज संगठित और गुणवान बनेगा, तभी देश में परिवर्तन आएगा। नेता–नारा–नीति–पार्टी–अवतार–सरकार–विचार–तत्वज्ञान ये सभी बातें सहायक हैं, समाज इन सभी का मालिक है। इसलिए मालिक को मूल रूप से जागरूक होना चाहिए।

‘संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज’, दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में 900 से अधिक प्रतिष्ठित गणमान्य हस्तियों के समक्ष सरसंघचालक जी ने विचार रखे। वर्ली स्थित नेहरू सेंटर सभागार में पहले दिन के प्रथम सत्र में सरसंघचालक जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणादायी यात्रा, उसकी ऐतिहासिक प्रगति और समाज में योगदान का विस्तार से अवलोकन करते हुए, स्थापना से लेकर राष्ट्र निर्माण में निभाई गई भूमिका तक की यात्रा को स्पष्ट किया। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे।

पहले सत्र में मोहन भागवत जी ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक संचलन करते हैं, लेकिन वह कोई पैरामिलिट्री संगठन नहीं है। संघ के स्वयंसेवक लाठी-काठी चलाते हैं, लेकिन संघ कोई अखिल भारतीय अखाड़ा नहीं है। संघ में भारतीय रागों के आधार पर घोष, व्यक्तिगत गीत, सामूहिक गीत होते हैं, इसलिए संघ कोई अखिल भारतीय संगीत विद्यालय नहीं है। संघ के स्वयंसेवक राजनीति में भी हैं, इसलिए वह कोई राजनीतिक दल नहीं है। केवल बाहरी रूप के आधार पर संघ का मूल्यांकन करने से गलतफहमियां पैदा होंगी। यदि संघ को समझना है, तो संघ शाखा का अनुभव लेना होगा। संघ की शाखा, कार्यकर्ता, उनका परिवार, कार्यक्रम, वर्ग, शिविर – इनका सूक्ष्म निरीक्षण प्रत्यक्ष रूप से करने पर ही संघ को सही रूप में समझा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि संघ का कार्य देश के लिए है। संघ किसी से प्रतिस्पर्धा करने या किसी की प्रतिक्रिया के कारण नहीं चलता। संघ किसी के विरोध में नहीं है। बिना किसी का विरोध किए संघ का कार्य चलता है। संघ सत्ता या प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं रखता।

संघ स्थापना की पृष्ठभूमि पर सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन की सभी धाराओं का अनुभव और चिंतन किया। इतिहास में भी हम बार-बार गुलाम बने। पराक्रम से स्वतंत्रता वापस पाई, लेकिन वह टिक नहीं सकी। अब भी हमें स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन फिर से गुलामी नहीं आएगी – इसकी क्या गारंटी है? हमारे समाज में कुछ कमी है, यह डॉ. हेडगेवार ने पहचाना। हम अपनी एकता भूल गए, स्वार्थ बढ़ गया, समाज गुणहीन बन गया, अनुशासन नहीं रहा। दरिद्रता, गरीबी और अज्ञान उत्पन्न हुआ। समाज को गुणवान, अनुशासित, समृद्ध और संगठित बनाए बिना स्वतंत्रता को टिकाया नहीं जा सकता। इसी उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार ने विभिन्न प्रयोगों के पश्चात 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि भारत का स्वभाव सनातन है। उन्होंने कहा, “धर्म निरपेक्षता शब्द गलत है, इसके स्थान पर पंथ निरपेक्षता शब्द होना चाहिए। बहना पानी का और जलना आग का धर्म है। धर्म हमारा स्वभाव और कर्तव्य है, जो इहलोक और परलोक में सुख देता है। धर्म सभी को उन्नत करता है। धर्म जिस सत्य के आधार पर खड़ा है, वह अस्तित्व की एकता का संदेश है। हमें महासत्ता नहीं बनना है। महासत्ता बल से अपना वर्चस्व स्थापित करती है। हमें विश्वगुरु बनना है, पूरे विश्व को जोड़ना है।”

दूसरे सत्र में सरसंघचालक जी ने कहा कि समाज की संगठित शक्ति के आधार पर देश को शक्तिशाली बनाने हेतु समाज को सशक्त करने के ध्येय को लेकर संघ आगे बढ़ रहा है। यदि आप सभी इसमें सहभागी होंगे तो कार्य अधिक गति से होगा। दैनिक शाखा में उपस्थित रहकर शरीर, मन, बुद्धि को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम करना, यह तो एक काम है ही, परंतु अपनी-अपनी रुचि और क्षमता अनुसार स्वयंसेवकों एवं सज्जन शक्ति द्वारा चलाए गए देशहित के कार्यों में सहभागी होने तथा प्रामाणिक रूप से, निस्वार्थ बुद्धि से समाज हित के लिए कोई भी कार्य करने पर आप संघ का ही कार्य कर रहे हैं, ऐसा संघ समझता है। इस मार्ग से भी आप स्वयं संघ से जुड़ सकते हैं। ‘if you have a theme, we have a team; if you have a team, we have a theme’ ऐसी आज संघ की स्थिति है।

स्वदेशी और स्वबोध पर उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत सी विदेशी वस्तु हैं, जिसके बिना हमारा दैनिक व्यवहार चल सकता है। हमारे देश का रोजगार कैसे बढ़े, इसका विचार करके ही वस्तु खरीदने का निर्णय प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। अपरिहार्य अंतरराष्ट्रीय व्यवहार भी किसी के दबाव में आए बिना हमारे देश के वातावरण के अनुकूल पद्धति से करना होगा।

पंच परिवर्तन के संकल्प को सरसंघचालक जी ने उद्बोधन में विस्तार से बताया। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन, स्व बोध, संविधान आधारित नागरिक कर्तव्य का पालन, इन पंच बिंदुओं पर दैनिक व्यवहार में अधिकाधिक जोर देने का आग्रह स्वयंसेवकों सहित सभी को करना चाहिए। पंच परिवर्तन को व्यवहार में लाने हेतु स्वयंसेवकों को पहल करनी चाहिए। धीरे-धीरे यह समाज मे संक्रमित होगा, इसके लिए विशेष प्रयास करें।

कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योगपति, फिल्म जगत के गणमान्य व्यक्ति, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विधिवेत्ता, खिलाड़ी, मीडिया प्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाओं के सदस्य, धर्मगुरु, लेखक, सोशल मीडिया तथा विज्ञापन क्षेत्र के पेशेवर शामिल हुए। इनमें राधाकिशन दमाणी, अभिनेता सलमान खान, रणबीर कपूर, हेमा मालिनी, संजय जिंदल, दीपक पारेख, अजय पिरामल, सुभाष चंद्रा, रोनी स्क्रूवाला, विनीत जैन, नितेश तिवारी, मोहित सूरी, रमेश तौरानी, बोनी कपूर, ओम राउत, वरिष्ठ निर्देशक सुभाष घई, पार्श्वगायक अदनान सामी, निर्देशक विपुल शाह, इंदर कुमार, प्रसाद ओक, आईआईटी मुम्बई के शिरीष केदारे, स्वामी स्वरूपानंद, अक्षत गुप्ता, अभिनेत्री अश्विनी भावे, ज्येष्ठ गायिका अनुराधा पौडवाल, वरिष्ठ पत्रकार भाऊ तोरसेकर, अभिनेता सुनील बर्वे, मुंबई विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. रविंद्र कुलकर्णी, एसएनडीटी विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. उज्वला चक्रदेव, इज़राइल–इटली दूतावास के अधिकारी सहित भारत के सिंधी गुरुद्वारा के प्रमुख जसकीरत जी भाईसाहब, अमर सिंह जी, राम सिंह राठौड़, वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम सहित अन्य मान्यवर उपस्थित रहे।

समाज के लिए आदर्श उदाहरण ही प्रेरणादायी

बस्तियों में, गांव-गांव में, चरित्रवान और निस्वार्थ बुद्धि से कार्य करने वाले, सभी के सुख-दुःख में सहभागी होने वाले ईमानदार व्यक्तियों के उदाहरण निर्माण हों और वे देशव्यापी बनें – इस उद्देश्य से संघ कार्य करता है।

सज्जन शक्ति से मित्रता मूलभूत भाव

हम समाज के प्रेम और सज्जनों की भावना के बल पर चले और कार्यकर्ताओं के विश्वास पर आगे बढ़े। संघ का विरोध हुआ, आज भी हो रहा है, परंतु विरोधियों के विरुद्ध कटुता का भाव न रखते हुए संघ के कार्यकर्ता आगे बढ़े। सज्जनों से मित्रता और सज्जन शक्ति का जागरण यह हमारे संघ कार्य का मूलभूत भाव रहा। समय बदला, परिस्थिति बदली, पर संघ ने अपनी दिशा नहीं बदली और अपने ध्येय की ओर संघ आगे बढ़ रहा है।

देशभर में समाज के सहयोग से स्वयंसेवक 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवाकार्य कर रहे हैं। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ कार्य का विस्तार अधिक व्यापक करने की ओर संघ प्रयत्नशील है।

 

 

 

 

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