*वैज्ञानिक उपचार के दुष्प्रभाव कम करने के लिए कोशिका स्तर पर कर रहे कैंसर का अध्ययन*
*भारतीय मरीजों पर आधारित मॉडल से सस्ती और लक्षित कैंसर चिकित्सा विकसित करने की दिशा में शोध*
मुंबई, 25 सितंबर 2026: कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी कैंसर मरीजों की जान बचाने में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ कई तरह के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। मुंबई स्थित एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर (ACTREC) में वैज्ञानिक कोशिका स्तर पर कैंसर के विकास का अध्ययन कर रहे हैं, ताकि यह समझा जा सके कि सामान्य कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं में कैसे बदलती हैं और भविष्य में उपचार को अधिक सटीक, कम विषाक्त तथा भारतीय मरीजों के लिए अधिक उपयुक्त कैसे बनाया जा सकता है।
कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRI), ACTREC के उप निदेशक डॉ. सोराब दलाल ने कहा कि कैंसर किसी एक घटना के कारण विकसित नहीं होता, बल्कि कई चरणों से गुजरते हुए वर्षों में सामान्य कोशिकाओं में बदलाव के बाद ट्यूमर का रूप लेता है। इन बदलावों को समझने से वैज्ञानिकों को कैंसर के विकास में शामिल जैविक प्रक्रियाओं और उपचार के संभावित लक्ष्यों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि बुनियादी कैंसर अनुसंधान का उद्देश्य केवल वैज्ञानिक शोध-पत्र प्रकाशित करना नहीं है। प्रयोगशालाओं में हासिल ज्ञान भविष्य में नई उपचार पद्धतियां विकसित करने और वैज्ञानिक खोजों को मरीजों के उपचार तक पहुंचाने का आधार बन सकता है।
डॉ. दलाल ने बताया कि वैज्ञानिक भारतीय कैंसर मरीजों की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए शोध मॉडल विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं। दूसरे देशों की आबादी पर आधारित मॉडलों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय भारतीय मरीजों के अधिक अनुरूप मॉडल विकसित करने से ट्यूमर के व्यवहार को समझने और संभावित दवाओं तथा उपचार पद्धतियों का परीक्षण करने में मदद मिल सकती है।
अनुसंधान का एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र कैंसर आनुवंशिकी और परिवारों में पाए जाने वाले आनुवंशिक कैंसर सिंड्रोम हैं। कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़े आनुवंशिक बदलावों की पहचान से ऐसे लोगों की पहचान की जा सकती है, जिन्हें नियमित और अधिक निगरानी की आवश्यकता हो सकती है। इससे कैंसर की शुरुआती पहचान और समय पर हस्तक्षेप के अवसर बढ़ सकते हैं।
डॉ. दलाल ने कैंसर उपचार की आर्थिक लागत कम करने के लिए अनुसंधान की आवश्यकता पर भी जोर दिया। वैज्ञानिक विभिन्न उपचार रणनीतियों पर काम कर रहे हैं, जिनमें पहले से उपलब्ध दवाओं के नए कैंसर उपचार में संभावित उपयोग तथा नए यौगिकों के अध्ययन शामिल हैं। इन प्रयासों से भविष्य में अधिक किफायती उपचार विकल्प विकसित करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने बुनियादी अनुसंधान को कैंसर के सफल उपचार की नींव बताते हुए इसकी तुलना हिमखंड से की। उन्होंने कहा कि मरीज तक पहुंचने वाला उपचार हिमखंड के दिखाई देने वाले हिस्से की तरह है, जबकि उसके पीछे वर्षों का व्यापक प्रयोगशाला अनुसंधान काम करता है।
डॉ. दलाल ने कहा, “बुनियादी अनुसंधान के बिना हमारे पास क्लिनिक में कोई उपचार नहीं होता। यही वह नींव है, जिस पर सब कुछ तैयार होता है।”
यह बातचीत छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के एसीटीआरईसी, मुंबई दौरे के दौरान हुई। पत्रकारों को कैंसर जीवविज्ञान, बुनियादी अनुसंधान, ट्यूमर मॉडल और प्रयोगशाला में हुई वैज्ञानिक खोजों को मरीजों के उपचार तक पहुंचाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई।
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