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संस्कृत भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है – डॉ. मोहन भागवत जी

Abhinesh Pandey June 20, 2026

रायपुर /नई दिल्ली, 20 अप्रैल 2026।

संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के नवनिर्मित भवन ‘प्रणवः’ के लोकार्पण अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि अक्षय तृतीया जैसे शुभ मुहूर्त पर ‘प्रणवः’ कार्यालय का लोकार्पण अत्यंत आनंददायक और शुभ संकेत है। यह सत्य संकल्प है। ‘प्रणवः’ सृष्टि के मूल नाद का प्रतीक है और इस नाम के साथ आरंभ हुआ यह कार्य पूर्णता की ओर अग्रसर होगा। उन्होंने संस्कृत को भारत का प्राण बताते हुए कहा कि यह केवल भाषा नहीं, अपितु भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है। भारत को समझने के लिए संस्कृत को समझना अनिवार्य है, क्योंकि इसी में हमारी ज्ञान-परंपरा, दर्शन और जीवन-मूल्य निहित हैं। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, अपितु भारत का प्राण है। यह हमारे विचारों, संस्कृति और ज्ञान का वह सार है, जिसे पूरी दुनिया को देने की आवश्यकता है।

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उन्होंने कहा कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है और इसके माध्यम से अन्य भाषाओं को भी सहजता से सीखा जा सकता है। संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान का व्यापक भंडार संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य में केवल रुचि नहीं, अपितु उसके उद्देश्य की स्पष्ट समझ, धैर्य और निरंतरता आवश्यक है। जैसे श्वास-प्रश्वास निरंतर चलता है और उसमें कोई ऊब नहीं होती, उसी प्रकार संस्कृत के कार्य को भी बिना उबते हुए निरंतर आगे बढ़ाना चाहिए।

संस्कृत सीखने के संदर्भ में उन्होंने “संभाषण पद्धति” को सबसे सरल और प्रभावी उपाय बताया। सरसंघचालक जी ने कहा कि संस्कृत को व्यवहार में लाकर, बोलचाल के माध्यम से आसानी से सीखा जा सकता है। संस्कृत संभाषण शिविर इस दिशा में अत्यंत उपयोगी हैं और इनके माध्यम से अल्प समय में भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यदि हम संस्कृत को फिर से गौरव दिलाना चाहते हैं, तो इसे लोकभाषा बनाना होगा। भारत को समझने के लिए संस्कृत अनिवार्य है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत भारती का कार्य सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने का है। संस्कृत के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाएँ और अधिक समृद्ध होंगी तथा समाज में सांस्कृतिक एकात्मता का भाव विकसित होगा।

संस्कृत भाषा के पुनरुत्थान एवं वैश्विक प्रसार के लिए समर्पित संस्कृत भारती के नवनिर्मित केंद्रीय कार्यालय ‘प्रणवः’ का लोकार्पण अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर सम्पन्न हुआ। लोकार्पण से पूर्व वैदिक परंपरा के अनुसार सरसंघचालक जी ने ‘गावो विश्वस्य मातरः’ की भावना के साथ गौमाता की पूजा-अर्चना की तथा शतचंडी यज्ञ में पूर्णाहुति प्रदान की। आचार्य सुधीर वेदपाठी, प्रो. रामराज उपाध्याय एवं प्रो. परमानंद भारद्वाज के सान्निध्य में संपूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय ने सबका स्वागत किया, अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने ‘प्रणवः’ भवन की संरचना, उद्देश्यों एवं भावी योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।

प्रधानमंत्री का संदेश – संस्कृत अतीत ही नहीं, भविष्य की भी भाषा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रेषित संदेश में कहा कि अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर ‘प्रणवः’ कार्यालय का लोकार्पण अत्यंत हर्ष का विषय है। उन्होंने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण की दिशा में एक प्रेरणादायी कदम बताया। संस्कृत हमारी प्राचीन एवं समृद्ध विरासत की संवाहिका है, जिसमें निहित ज्ञान-विज्ञान और दर्शन मानवता की अमूल्य धरोहर हैं। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है, जिससे संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिली है। संस्कृत न केवल अतीत की, अपितु वर्तमान और भविष्य की भी सशक्त भाषा है और ‘प्रणवः’ कार्यालय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री का शुभकामना संदेश सचिन कठाले ने पढ़ा। कार्यक्रम में शारदा पीठ, श्रृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखरभारती का संदेश भी पढ़ा गया।

अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने प्रस्तावना में कहा कि संस्कृत भारती की स्थापना वर्ष 1981 में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के उद्देश्य से हुई थी। यह आगे चलकर एक व्यापक संस्कृत आंदोलन के रूप में विकसित हुआ और 1995 में इसे ‘संस्कृत भारती’ नाम प्राप्त हुआ। वर्ष 1981 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन आज 28 देशों और भारत के 660 जिलों तक फैल चुका है।

यह कार्यालय आधुनिक सुविधाओं और प्राचीन परम्परा का संगम है। मुख्य लक्ष्य देश की 10 प्रतिशत जनसंख्या तक संस्कृत पहुँचाना और 12 भाषाओं के माध्यम से पत्राचार द्वारा शिक्षण कार्य को गति देना है। यहां वास्तु, शिल्प, वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) और धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों पर परामर्श के लिए विद्वान सदैव उपलब्ध रहेंगे।

समारोह में सहयोग देने वाले ११ व्यक्ति एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सम्मान किया गया। समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेश सोनी, केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन सहित देश-विदेश से आए शिक्षाविद्, विद्वान और संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे। यह भवन अब संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण और वैश्विक शोध के एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

 

 

 

 

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