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राष्ट्र चेतना का दीप: वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर

Abhinesh Pandey July 8, 2025

समय रथ.

दृढ संकल्प, असीम ईश्वरभक्ति के बल पर व्यक्ति कैसे गढ़ता जाता है इसकी झलक वं मौसी जी के जीवन से मिलती है। व.मौसी जी उपाख्य लक्ष्मीबाई केलकर जी।विश्व के सबसे विशाल महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका।एक संकल्पमय जीवन।

स्वतंत्रता से भी कई दशक पूर्व पराधीनता, बालिका शिक्षा से वंचित,संचार- यातायात के कम संसाधन, जाति – पंथ के भेदभाव, रूढ़ियों से जकड़ा समाज का वह काल।

और जैसे इस सब प्रश्नों के समाधान के रूप में एक दृढ़ संकल्पित जीवन व. लक्ष्मीबाई केलकर जी।

सन 1936 में राष्ट्र सेविका समिति के शुभारंभ से ही अनेक स्त्रियों के जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। विश्व की अनेक बहनें उनको मौसी कहकर माँ -सी मानती हैं।

उनकी जीवन गाथा ही हम सबके लिये प्रेरणादायी है। उनके जीवन का प्रत्येक पड़ाव हमारे लिये जीवनशिक्षा है।

उनके विचार न केवल उस काल में बल्कि आज भी उतने ही आधुनिक, उपयोगी और समाज में सकारात्मकता के प्रवाह हेतु आवश्यक प्रतीत होते हैं।

वर्तमान में समाज के लिए आवश्यक पांच परिवर्तन के विषय पर व.मौसी जी के विचार समझने का प्रयास करते हैं।

*स्वदेशी को लेकर मौसी जी के विचार:*

उनके बालपन से ही राष्ट्रभक्ति के अंदर अमिट संस्कार पड़े।मां यशोदाबाई अपनी सहेलियों को एकत्रित कर ‘केसरी’ का सामूहिक वाचन करती थी। उसका गहरा प्रभाव कमल(बचपन का नाम)के बाल मन का होता था। स्वदेशी के प्रति नितांत श्रध्दा का भाव व्याप्त था। घर में इन संस्कारों के कारण ही वह मिशनरी स्कूल में भी जागृत रही।

अपने उद्बोधनों और आचरण में उन्होने तब के समय ही 5 स्व बताए थे। स्वदेशी, स्वभाषा, स्व संस्कृति, स्वधर्म और स्वावलंबन ही स्वाधीनता के आधार है।

स्वदेशी हमारे लिए इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह देश की आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है। जब हम देश में बने उत्पादों का उपयोग करते हैं, तो इससे हमारे किसानों, कारीगरों और छोटे उद्योगों को सीधा लाभ मिलता है। स्वदेशी अपनाने से न केवल आर्थिक मजबूती आती है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रप्रेम का भी प्रतीक बनता है। इससे हम विदेशी निर्भरता को कम करते हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हैं। स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग हमारे समाज को आर्थिक, सांस्कृतिक और आत्मिक रूप से सशक्त बनाता है।

वे घर में आने वाली विदेशी तथा चीनी कपड़ों पर रोक लगा स्वदेशी चीजों को प्राथमिकता देती थी।

*सामाजिक समरसता को लेकर मौसी जी के विचार:*

वं. मौसी जी की यह दृढ धारणा थी कि सामाजिक समरसता यह प्रवचन, आंदोलन के विषय नहीं हैं।उन्हे जीवन मे उतारना चाहिये। उन दिनों छूआछूत की कट्टर कल्पनाओं के कारण हरिजन कर्मचारी अपने घर में रखना समाजमान्य नही था। परंतु वं. मौसी जी ने अपने घरमें ऐसे सहयोगी रखे। आग्रह इसका था कि वे प्रामाणिक हो स्वच्छता रखें।

विधवा पुनर्विवाह भी ऐसा ही विषय था। एक ऐसी गृहिणी को लोग अपने घर के मंगल कार्य में आमंत्रित नही करते थे। उस महिला के मन की व्यथा वं. मौसी जी के संवेदनशील मन को चुभ गयी। उस महिला को अपने घर में सुहागन के नाते बुलाना उन्होंने प्रारंभ किया, उसे सम्मान दिया।और जमीनदार परिवार से ही यह प्रथा प्रारंभ हो गयी।तत्कालीन परिस्थितियो में वं. मौसी जी का यह निर्णय कितना प्रगतिशील, साहसी एवं क्रांतिकारी था।

*नागरिक कर्तव्य को लेकर मौसी जी के विचार :*

नागरिक कर्तव्य अपने देश के प्रति दायित्व का भाव है।केवल अधिकारों की चिंता न करके दैनिक आचरण में आदर्श नागरिक के रूप में कर्तव्यों का पालन।

इस विषय की गंभीरता व.मौसी जी के जीवन में स्पष्ट दिखती है।उन्होंने घर में पढ़ाने वाले शिक्षकों का सहयोग लेकर एक विशेष बालिका विद्यालय वर्धा में स्थापित किया जो आज भी प्रखर रूप से संचालित है।

स्वतंत्रता संग्राम की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महात्मा गांधी जी के आवाहन पर उन्होनें एक क्षण में अपनी सोने की माला दान कर दी और प्रत्येक महिला मंडल कार्यक्रम में सभा के लिए निधि राशि का आवाहन कर राष्ट्रबोध जगाने का संकल्प लिया।

हमारे बालक बालिकाओं को राष्टीय दृष्टिकोण मिले । स्वयं के जीवन से पूर्व देश को महत्व देने के संस्कार जगाने हेतु मौसी जी राष्ट्र व्यक्तित्वों के जीवन पर चित्रकला प्रतियोंगिता रखती थीं।उनके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति राष्ट्र चिंतन से युक्त हो जाता था।ऐसा आचरण उनका था।

*पर्यावरण को लेकर मौसी जी के विचारः*

मौसी जी का जीवन प्रकृति और संस्कृति के गहरे जुड़ाव का प्रतीक रहा है। उनके पर्यावरण संबंधी विचारों में आत्मीयता, सादगी और संरक्षण की भावना साफ झलकती है। वे पर्यावरण को केवल संसाधन नहीं, बल्कि माँ मानती थीं। उनका मानना था कि जैसे हम माँ की सेवा करते हैं, वैसे ही हमें प्रकृति की भी सेवा करनी चाहिए।

उनका विश्वास था कि स्वदेशी जीवनशैली अपनाकर ही हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। प्लास्टिक, रासायनिक खादों और भोगवादी संस्कृति से दूरी बनाना आवश्यक है। वे प्रतिदिन स्वच्छता अभियान में भाग लेती थीं और अपने श्रीराम कथा प्रवचनों में नियमित रूप से वृक्षारोपण की प्रेरणा देती थीं। रामकथा उनके लिए मात्र भक्तिमार्ग को पुष्ट करने का साधन नहीं था,अपितु जीवन में ऐसे गुण विकसित हो तब कथा सार्थक है ऐसा आग्रह रहता था ।

मौसी जी का मानना था कि गाँवों को आत्मनिर्भर बनाकर ही हम पर्यावरण संकट से बच सकते हैं। उनकी प्रेरणा से कई स्थानों पर जल संरक्षण, जैविक खेती और वर्षा जल संचयन के प्रयास शुरू हुए।

वे यह संदेश देती थीं कि मनुष्य को प्रकृति से संघर्ष नहीं बल्कि सहअस्तित्व की भावना से जीना चाहिए।

*आदर्श कुटुंब के विषय में मौसी की के विचार:*

वं. मौसी जी की दृष्टि में सुसंस्कारित परिवार ही राष्ट्र निर्माण का आधार है।वह सदैव बालिकाओं और गृहणियों को शिक्षा देती थीं कि परिवार के सभी सदस्यों का लालन-पालन, पोषण,संरक्षण, संवर्धन शिक्षण, संस्कार यह उनका ही दायित्व है। घर के सभी सदस्यों का चरित्र निर्माण करना , नीति एवं धर्म से विलग नहीं होने देना। घर के सदस्यों की मातृ भाव से परिचर्या करना, घर के सभी लोग आपस में प्रेम, सुरक्षा, संस्कार और प्रेरणा प्राप्त हों, अपनी संस्कृति का यत्न पूर्वक पालन हो।समाज के साथ समरसता पूर्ण संबंध बन रहे। बड़े छोटों को वात्सल्य दें बच्चे आदर और सेवा। दान ,यज्ञ और सेवा परंपरा, शिक्षा या ज्ञान परंपरा ,कुल परंपरा, वैचारिक समरसता इन सब विषय पर वं. मौसी जी स्वयं अपने परिवार में भी सजग रहती थीं और देश के लाखों परिवारों के लिए भी यह प्रशस्त किया। ऐसे प्रगतिशील विचारों की धनी वंदनीय मौसी जी के दृढ़ संकल्पित जीवन को शत-शत नमन।

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